जल का निर्माण कैसे हुआ?
धरती पर बहुत मात्रा में पानी का भंडार है। जल एक रासायनिक पदार्थ है जो हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से मिलकर बना है। पानी द्रव अवस्था,बर्फ तथा वाष्प(गैशीय) के रूप में हमारे पर्यावरण में मौजूद है, जल जीवन का आधार हैं। आज पृथ्वी ही ऐसा ग्रह है जहां पानी मौजूद है, क्योंकि पृथ्वी की संरचना अन्य ग्रहों के तुलना में अलग है। पृथ्वी का लगभग 71% भाग को 1.460 पिटा टन जल से आच्छादित है। जब जल का निर्माण कैसे हुआ, इसका हल ढूंढते है। तो इसके बारे में अधिकतर कम जानकारी मिलती है। पानी की उत्पति की पहेली सुलझा नहीं है, फिर भी अभी तक जो जानकारी मिली है। वो जानकारी प्राप्त करते हैं।
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार
भारतीय दर्शन ने जल को शक्ति पदार्थ माना है भारतीय दर्शन मानता है कि पानी अजर है वह सृष्टि के पहले मौजूद था। वह मौजूदा कल में मौजूद है और भविष्य में सृष्टि का विनाश होने के बाद भी मौजूद रहेगा। भारतीय पुरातन जल वैज्ञानिकों के अनुसार जल वायु, आकाश और तेजस(अग्नि या विद्युत) के पारस्परिक क्षोभ के कारण उत्पन्न हुआ है। हमारे यहां के भारतीय ऋषियों–मुनियो के अनुसार आकाश पंचमहाभूतों का जनक होता है। आकाश (वायु) के कारण ही शब्द, नाद या ध्वनि सुनाई पड़ती है, उन्होने कहा है की यदि आकाश का अस्तित्व नहीं रहता तो ध्वनि को कोई माध्यम नहीं मिल पाती तो कुछ सुनाई नहीं देती। पानी की उत्पति कुरान के अनुसार बताया है, अल्लाह ने 6 दिनों में स्वर्ग और पृथ्वी का निर्माण किया। और कहा है अल्लाह का सिंहासन पानी पर स्थित है, उन्होंने ही पानी से सभी जीवित प्राणियों का निर्माण किया है। और बाइबल के अनुसार ईश्वर ने पहले स्वर्ग और फिर पृथ्वी को बनाया। और सूर्य चांद तारा का निर्माण किया। प्रारंभ के समय में धरती निराकार और खाली थी, पानी पर केवल ईश्वर की सत्ता थी और उन्होंने ही प्रकाश वायु आकाश का निर्माण किया। उन्होंने महासागर और धरती को अलग–अलग किया। इस तरह से विभिन्न धार्मिक ग्रंथों ने अपनी अवधारणाएं पानी की उत्पति के बारे में बताई। अब आधुनिक विज्ञान की अवधारणाओं के बारे जानते है।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार पानी की उत्पति
आधुनिक विज्ञान के अनुसार विशेषज्ञों को पृथ्वी पर पानी की उत्पति का सिद्धांत का पता चला है पर उस मत का ठोस प्रमाणिकत नही मिली है। विशेषज्ञों के बीच अलग–अलग सिद्धांत हैं। विशेषज्ञों के खोज में पाया गया की पृथ्वी के पुरातन काल के चट्टानों में पानी की इतनी मात्रा पाई गई की उससे महासागरों का निर्माण हो सकता था। तो यह हो सकता है की पृथ्वी के निर्माण के समय से ही पानी मौजूद हों। अन्य विशेषज्ञों की मानता है की पृथ्वी पर पानी बाहर से आया है, जो उल्कापिंडों और क्षुद्रग्रहों के टकराने से आया होगा।
इस शोध के आधार वैज्ञानिकों का मत है की पृथ्वी पर पानी उल्कापिंडों और क्षुद्रग्रहों से केवल 5% ही आया होगा और बाकी 95% पृथ्वी की खुद की संरचना में शामिल रहा होगा।
• अमेरिकी वैज्ञानिक माइक ड्रेफ के अनुसार पानी पृथ्वी के प्रारंभ से ही मौजूद है, उनका सिद्धांत था की जब सौर मंडलीय धूल कणों से पृथ्वी का निर्माण हो रहा था, तो उस समय धूल कणों पर पहले से ही पानी मौजूद था।
जलचक्र(the water cycle)
पानी पृथ्वी पर लगातार एक चक्र में घूमता रहता है जिसे जलचक्र कहते है, इसमें पानी कभी वाष्प अवस्था में तो कभी द्रव अवस्था में जाता रहता है। जब समुंद्र का पानी वाष्पीकरण या ट्रांसपिरेशन होकर वाष्प में बदलता है और बादल बनकर फिर बारिश के रूप में धरती पर बरसता है, और वह पानी समुंद्र में मिल जाती है। इसीतरह पूरा चक्र चलता रहता है। जीवन के लिए साफ और ताजा पानी बहुत ही आवश्यक है, किंतु दुनिया के कई देशों में भयंकर जल संकट है। और अनुमान है की 2025 तक विश्व की आधी आबादी इस जल संकट से गर्षित होगी। आज के समय में मीठे जल की खपत कृषि क्षेत्र में 75% तक होती है, और अन्य कारखानों, उधोगों में उपयोग किया जाता है। जल पृथ्वी पर प्राकृतिक रूप से तीनों अवस्थाओं में पाया जाता है,
प्रकृति में जल समंदर बर्फ और वाष्प/बादल नदियों तालाबों झीलों में मौजूद है। जल में अनेक पदार्थ घुल जाता है, इसी से पानी का स्वाद अलग अलग होता है। हमलोग मीठा जल पीते हैं, जिसमें लवण मिला रहता है। शुद्ध पानी स्वाद में फीका होता है, मनुष्य ठंडे गुनगुना जल पीना पसंद करते है। जल एक रसायनिक पदार्थ है, जिसका रासायनिक सूत्र H2O है। हमलोग जब पानी को गर्म करतें है तो 100⁰C पर उबलना शुरू हो जाता है, और माउंट एवरेस्ट के शीर्ष पर 68⁰C पर ही उबलना प्रारंभ कर देता है। लेकिन भू–उष्मीय छिद्रों के निकट जल का तापमान सैकड़ों डिग्री तक पहुंचने पर भी यह द्रव अवस्था में रहता है।
जल हमारे लिए बहुत उपयोगी है, इसीलिए हमलोगो को अनावश्यक जल बर्बाद नहीं करना चाहिए।

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