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कागज। कागज के अविष्कार की कहानी।Paper।The story of the invention of paper।

कागज के आविष्कार ।

कागज पतली लचीली बहु उपयोगी सामग्री हैं, जो लगभग सभी कामों में उपयोग में  लाया जाता हैं। कागज लेखन, किताब, चित्रकारी, थैला और पत्र इत्यादि में उपयोग करते हैं। कागज आमतौर पर सफेद होता हैं और अन्य कामों के लिए अलग अलग डिजाइनिंग किया जाता हैं। कागज परंपरागत रूप से मिल्ड प्लांट और कपड़ा फाइबर के संयोजन से बनाई जाती हैं।




               चीन में पहली पेपर मेकिंग प्रक्रिया की शुरुआत पूर्वी हान राजवंश (25–220ईसा पूर्व) के दौरान किया गया था। जो उनके अधिकारी “कैलून” को दिया गया था, यही पेपर मेकिंग की प्रक्रिया 8वीं शताब्दी के दौरान इस्लामी दुनिया तक फैल गया। और 11वीं शताब्दी तक यूरोप में लाया गया था। यूरोप से ही 19वीं शताब्दी में लकड़ी आधारित कागजों का अविष्कार किया जाने लगा। 



    प्राचीन काल में लिखने के लिए तार पत्रों, शिलालेखों तथा लकड़ी का उपयोग किया जाता था इतिहासकारों के अनुसार सबसे पहले कागज का आविष्कार चीन में हुआ। 201ई०पू० हान राजवंश के समय चीन के निवासी “त्साई–लुन” ने कागज का आविष्कार किया। “त्साई–लून” के अविष्कार से पहले बांस पर और रेशम के कपड़े पर लिखा जाता था। रेशम बहुत महंगा हुआ करता था और बांस बहुत भारी होता था तब “त्साई–लून” ने हल्का और सस्ता बनाने के लिए भांग, शहतूत के पत्ते, पेड़ की छाल तथा अन्य तरह के रेशों से कागज का निर्माण। उसके बाद कागज का इस्तेमाल पूरे विश्व में होने लगा। इस अविष्कार के लिए “त्साई–लुन” को “कागज का संत“ कहा जाने लगा। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कागज का पहला प्रयोग मिस्र में किया गया था



 जहां पेपिरस एंटीकोरियम नामक घास द्वारा कागज बनाया जाता था। जिसे पेपीरस या पेपिरी कहा जाता था एक लेखक “नैश” के “एकुसोड्स” ग्रंथ से जानकारी मिलती हैं की पेपीरी का निर्माण लगभग चौदह सौ वर्ष पूर्व मिस्र में हुआ था।




  • भारत में कागज का प्रयोग :–

भारत में सबसे पहले कागज का  उपयोग सिंधु सभ्यता के दौरान हुआ और भारत में कागज बनाने का पहला कारखाना कश्मीर में “सुलतान जैनुल आबिदीन” (1417–67 ई० में) ने लगाया गया था। भारत में आधुनिक तकनीक पर आधारित कागज बनाने का सबसे पहला कारखाना हुगली नदी के तट पर 1870 में कोलकाता के नजदीक “बाली” नामक स्थान पर लगाया गया। इसके बाद टीटागढ़(1882ई०में), बंगाल (1887ई०में), जगाधरी(1925ई०में), गुजरात(1993ई०) आदि साधनों पर कागज बनाने वाली कारखानों को लगाया गया।



       आरम्भ में यह कागज हाथ से बनता था या फिर कागज का काम पता, पत्थर, लकड़ियां इत्यादि करता था, मानव विकास के साथ कागज बनाने का विकास होने लगा। और अब कागज बनाने वाली आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल होने लगा। इस समय विभिन्न प्रकार की मशीनों द्वारा अलग-अलग प्रकार की कागज बनाई जाती है। जैसे– बुक कागज, सूत कागज, फोटो कागज।, ड्राइंग कागज, इंकजेट कागज इत्यादि। इस कागज से विभिन्न प्रकार की उपयोगी सामने बनाई जाती हैं। जैसे– किताब, बैग, कलेंडर इत्यादि वस्तुएं। कागज आधुनिक रूप से मुख्यता बास लकड़ी घास पुराने कपड़ों गन्ने की खोई से बनाई जाती है। कागज के निर्माण प्रक्रिया में एक विशेष प्रकार की रेशा –सेल्यूलोस का उपयोग किया जाता हैं। यह एक कार्बनिक यौगिक हैं सेल्यूलोस तीन प्रकार का होता है। (i) अल्फा सेल्यूलोस, (ii) बीटा सेल्यूलोस (iii) गामा सेल्यूलोस कपास/रूई में 99% मात्रा अल्फा सेल्यूलोस का होता है। लेकिन कपास महंगी होने के कारण इसका उपयोग कागज बनाने में नहीं किया जाता है कपास का  उपयोग केवल कपड़ा बनाने में किया जाता है। पौधे में सेल्यूलोस पाया जाता है।



 जिससे पेड़ पौधे की कोशिकाएं बनती है यह तना में पाया जाता है। ये सभी पेड़ों में अधिक मात्रा में नहीं पाई जाती है इसीलिए कागज बनाने के लिए कुछ खास पेड़ों के लकड़ियों का उपयोग किया जाता है। क्योंकि सेल्यूलोस की मात्रा अधिक रहने पर कागज अच्छा बनता है पेड़ों के तना में सेल्यूलोस, लिग्रिन, पेक्टिन, खनिज–लवण, वसा, गोंद,प्रोटीन आदि भी पाया जाता है। कागज बनाने के लिए मुख्यता बांस, देवदार, भोज, सफेदा, पपलर, फ़र आदि वृक्षों के लकड़ियों से कागज बनता है।




  • कागज बनाने की प्रक्रिया:–  सबसे पहले लकड़ी में से छाल साफ कर दी जाती हैं फिर लकड़ी को छोटे-छोटे भाग बनाने के लिए चिप्पर मशीन में डाल दिया जाता है। और चिप्पर मशीन से 3 सेंटीमीटर से 5.5 सेंटीमीटर के आकार में काट कर डाइजेस्टर में डाल दिया जाता है। तथा व्हाइट–लिकर रसायन मिलाकर पकाया जाता हैं इसे पल्प मील विभाग कहते हैं। यह टुकड़े डाइजेस्टर में लुगदी(पल्प) में बदल जाते है। फिर लुगदी को क्लोरिन या ऑक्सीजन द्वारा सफाई(ब्लीचिंग) कि जाती हैं। इस प्रक्रिया को ब्लीचिंग/क्लीनिंग कहते हैं, फिर इसको कुटाई(बीटिंग) और सफाई(रिफाइनिंग) की जाती हैं और एक स्टॉक सेक्शन होती हैं उसमें इसको भेज दिया जाता हैं फिर इस लुगदी में आवश्यक कागज बनाने के अनुसार रंग(डाई), पिग्मेंट और फिलर इत्यादि मिलाया जाता है और सेंटी क्लीनर्स मशीन में सफ़ाई के लिए डाला जाता हैं। सफाई करने के बाद मशीन चेस्ट सेक्शन में भेज दिया जाता हैं। यहां से इस फैन पंप के माध्यम से मशीन के हेड बॉक्स में भेज दिया जाता हैं। मशीन के हेड बॉक्स में यह  वायर पर जाता हैं और पानी अलग हो जाता हैं और पेपर सीट बन जाती है। इसके बाद पेपर सीट प्रेस सेक्शन में चली जाती है और फिर ड्रायर से गुजार कर सुखाया जाता है। कलेंडर सुपर कलेंडर से पॉप रील पर जमा किया जाता है। अब पॉप रील से कागज के बड़े रोल को रिवाइडर से छोटे पेपर रोल्स में और कटर से अलग-अलग आकार में काटा जाता है और फिनीशिंग सेक्शन में भेज देते हैं। इस तरह से अलग-अलग कार्यों के लिए कागज का उपयोग किया जाता है और किताब कॉपी पेपर थैला इत्यादि बनकर हमारे पास आता है।





  • वातावरण पर प्रभाव:–

कागज का उपयोग बहुत मात्रा में होने के कारण कागज का उत्पादन भी बड़ा है जिसके कारण अधिक मात्रा में पेड़ की कटाई की जाती है और पेड़ का उपयोग केवल कागज बनाने में ही नहीं अपितु घर, फर्नीचर के समान  फैक्ट्रियों इत्यादि मैं इसका उपयोग किया जाता है। जिससे पेड़ की कटाई और बढ़ गई है इससे वातावरण पर प्रभाव पड़ता है।



दुनिया भर में पिछले 40 सालों में कागज की खपत 400% की वृद्धि हुई है इसके साथ वनों की कटाई में वृद्धि हुई है।  आज के समय में जितने भी कार्यों के लिए पेड़ काटे जाते हैं उसमें से 35 प्रतिशत पेड़ कागज बनाने के लिए काटा जाता है लेकिन बहुत सारी पेपर कंपनियां पेड़ों के पेड़ लगाते हैं। और पर्यावरण के लिए मदद करते हैं। अमेरिकी प्रति वर्ष शुरू 16 अरब पेपर कप इस्तेमाल करता है पेपर के सफेद/ब्लीच के साधारण तरीके से पर्यावरण में क्लोरिन क्लोरिनेट्स डाईऑक्सिन निकलते हैं। जो बहुत बड़ी पर्यावरणीय प्रदूषक हैं जिससे मानव पर स्वास्थ्य तथा बीमारी से प्रतिरोधक क्षमता में कमी होती है।


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