आज के समय में पर्यावरण को समझना बहुत ही जरुरी हो गया है, क्योंकि पृथ्वी पर प्रदूषण बहुत ही बड़ी मात्रा में मौजूद है। इसका नियंत्रण करना आवश्यक हो गया है। पृथ्वी का तापमान बढ़ने से जंगलों में आग लग जाती, बर्फ की चट्टानें पिघलने लगती, बहुत सारी जीवों की प्रजातियों लुप्त होते जा रही है।
पर्यावरण:–
पर्यावरण हमारे चारों ओर में घिरी हुई सभी वस्तुएं को कहते हैं, पर्यावरण उन सभी रासायनिक, भौतिक एवं जैविक कारकों की समष्टिगत एक इकाई है। पर्यावरण में उपस्थित सभी संघटकों में छोटे से छोटे सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े–मकोड़े, सभी जीव जंतु और पेड़–पौधे आ जाते हैं। और इसके साथ ही जीवों की सभी क्रियाएं। यहां तक की मनुष्य भी पर्यावरण का एक हिस्सा है, पर्यावरण अपने चारों ओर घेरे हुए सभी वस्तुओं पर अपना प्रभाव डालती हैं। उतरी ध्रुव के नजदीक रहने वाले लोगों सफ़ेद होते है, जबकि दक्षिण ध्रुव के नजदीक रहने वाले लोग काले होते है। पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों की लंबाई अधिकतर छोटे होते है, और मैदानी क्षेत्र के लोग लंबे होते है। इस तरह से वातावरण या पर्यावरण हम सब पर अपना प्रभाव डालती है।
इस समय मनुष्य अपने उपयोग के लिए पर्यावरण में उपस्थित सभी साधनों का उपयोग करके एक नया दुनिया बना दिया है। इसीलिए पर्यावरण को दो भागों में बांटा गया है।
1. मानव निर्मित पर्यावरण– मानव अपने सुविध के लिए जो संसाधन विकास किया है, अर्थात जो मानव ने निर्मित किया है। उसे मानव निर्मित पर्यावरण कहते है।
2. प्राकृतिक निर्मित पर्यावरण– वैसे पर्यावरण जो पूर्णरूपेण प्राकृतिक निर्मित हो, जहां के लोग पूर्ण रूप से प्राकृतिक पर निर्भर हो, ऐसे पर्यावरण को प्रकृतिक निर्मित पर्यावरण कहते है।
अभी भी बहुत सारे द्वीप और देश है जो पर्यावरण के संसाधनों का आधुनिक रूप से उपयोग नहीं कर रहा है, जिसके कारण वहां के लोग प्राकृतिक पर ही निर्भर रहते हैं।
आधुनिक मनुष्य द्वारा आर्थिक उद्देश्य और अपने जीवन में विलासिता के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए पर्यावरण को व्यापक रूप से छेड़छाड़ से प्राकृतिक वातावरण का संतुलन नष्ट किया हैं। जिसके कारण प्राकृतिक व्यवस्था पर ही संकट उत्पन्न हो गया है, इससे प्रकृति पर संकट उत्पन्न होना ही अवनयन कहलाती है।
पर्यावरण के संसाधनों के उपयोग से बहुत सारी उधोंगों का निर्माण हो गया हैं, जिससे प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन इत्यादि की समस्याएं उत्पन्न हो गई है। जो बता रहीं हैं की मनुष्य अपनी जीवन शैली के बारे में पुनर्विचार करें। जिससे पर्यावरण का अधिक से अधिक नुकसान न हो, और पर्यावरण संरक्षण एवं पर्यावरण प्रबंधन से वातावरण सुरक्षित रहें। मनुष्यों को तकनीकी रूप से किए गए परिवर्तनों से क्षति को कम करने पर ध्यान देना चाहिए। आर्थिक और राजनैतिक रूप से भी पर्यावरण पर जकरूक होना चाहिए।
पर्यावरण के सभी वस्तुएं भूमि, जल, पेड़–पौधे एवं जीव–जंतुओं का समूह हमारे चारों ओर है। यह औधोगीकरण तथा नगरीकरण के कारण वातावरण का अधिक से अधिक दोहन हो रहा है। जिसका परिणाम पर्यावरण के संतुलन पर पड़ता है, जो भूमि उपजाऊ हुआ करती थी अब वह भूमि अधिक फसल नहीं दे रही है। इससे हालत गंभीर हो सकती है।
समस्याएं–
प्रदूषण अथवा पर्यावरणीय प्रदूषण पर्यावरण में ऐसे पदार्थ जो प्राकृतिक वातावरण को हानिकारक और अवांछित हो, जिसे पर्यावरण को कोई समयस्यं हो तो ऐसे पदार्थ को प्रदूषक या दुषक कहते हैं।
संसाधनों के उपयोग से जितना लाभ और उपयोगी होती है, उतना ही इनसे जहरीले गैस भी निकलते हैं। कोयला पेट्रोलियम में कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन तथा सल्फर होते है, जिनके जलने से कार्बन डाइऑक्साइड, जल, नाइट्रोजन और सल्फर से ऑक्साइड निर्माण होता है। ये उच्च सांद्रता में हानिकारक और विषैले होते है पर्यावरण समस्याएं प्रदूषण, मानव जनसंख्या और मानव द्वारा संसाधनों के उपयोग में वृद्धि से जुड़ी है, इससे पृथ्वी पर जीवन और संधारणीयता को खतरा उत्पन्न करते है। अतः इसके अंतर्गत जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जैव विविधता का क्षरण और अन्य प्राकृतिक आपदाएँ इत्यादि को सामिल किया जा सकता है। कोयला पेट्रोलियम पदार्थ के उपयोग से धरती का तापमान बढ़ रहा हैं इसके रोकथाम के लिए सभी देश प्रयास कर रहा हैं।
संसाधन न्यूनीकरण
न्यूनीकरण से आशय प्राकृतिक संस्थानों का मनुष्य द्वारा आर्थिक लाभ के लिए इतनी तेजी से दोहन की उसका प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनर्भरण न हो पाए। जितनी भी बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन है जैसे कोयला, पेट्रोलियम, खनिज पदार्थ उन्हें दुबारा निर्माण में लाखों वर्ष का समय लग जाता है, इन संसाधनों को तुरंत नहीं बनवाया जा सकता हैं। संसाधनों को तेजी से खपत होने का जनसंख्या में तेज वृद्धि दर, उधोगों में वृद्धि आदि जिम्मेवार माना जा रहा है।
संसाधनों के भाग
संसाधन– प्राकृतिक में पाई जाने वाली सभी वस्तुएं संसाधन कहलाती हैं।
इसे दो भागों में विभक्त किया जाता है– 1. नवीकरणीय संसाधन 2. अनविकरणीय संसाधन
नवीकरणीय– वैसे संसाधन जिसे पुनःनिर्माण किया जा सकता है, जो संसाधन इतनी मात्रा में हैं की उसका क्षय नहीं हो सकता है उन्हें नवीकरणीय संसाधन या अक्षय संसाधन कहते हैं। जैसे सौर ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा, जल ऊर्जा इत्यादि।
अनविकरणीय संसाधन– वैसे संसाधन जिसका निर्माण होने में लाखों वर्ष लग जाता है जिसे दुबारा निर्माण नही किया जा सकता है उसे अनविकरणीय संसाधन कहते हैं। जैसे– कोयला, पेट्रोलियम आदि
अनविकरणीय संसाधन का दोहन कर प्राकृतिक भंडार को समाप्त कर मानव जीवन के लिए कठिन परिस्थितिया पैदा कर सकता है। क्योंकि इसकी बनने की प्रक्रिया लंबी/दीर्घ काल वाली होती हैं, यह बहु मूल्य सम्पदा लाखो वर्षों के बाद ही पुनः निर्माण होता हैं। कोयला और पेट्रोलियम धरती के नीचे सीमित मात्रा में हैं, यदि यह एक बार खत्म हो जाए तो इसके निर्माण के लिए लंबे अवधि तक इंतजार करना पड़ेगा। इस बीच विकाश पूरी तरह रुक जायेगा, इसीलिए जीवाश्म ईंधन की खपत सावधानीपूर्वक करनी चाहिए, ताकि इनका उपयोग लंबे समय तक कर संकें।
क्योटो प्रोटोकॉल
लगातार जैविक ईंधन के प्रयोग से धरती का तापमान बढ़ रहा हैं इसके रोकथाम के लिए 1997 में भूमंडलीय ताप के वृद्धि को रोकने के लिए जापान के क्योटो शहर में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस क्योटो प्रोटोकॉल के अनुसार सभी औद्योगिक देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर में कमी करेंगे। इस सम्मेलन में 141 देशों ने भाग लिया। इसका यही लक्ष्य रखा गया की ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन करने वाले उपकरणों का उपयोग कम किया जाए और उन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाय जो प्रदूषण कम उत्सर्जित करता हो। ग्रीनहाउस गैसों को अधिक उत्सर्जित करने वाला जीवाश्म ईंधन कोयल, पेट्रोल, डीजल इत्यादि हैं।

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