आजकल प्रत्येक व्यक्ति रोग से ग्रसित हैं, चाहें वो शारीरिक या मानसिक रूप से हर व्यक्ति रोग से ग्राषित रहता है। सभी लोग अपनी स्वार्थ के पीछे तेजी से दौड़ रहे हैं इससे हमे कहीं न कहीं शारीरिक समस्या उत्पन्न होती हैं। हम सबको चिंता करना, जरूरत से अधिक सोचना, नकारात्मक भावनाएं से ग्राषित होना। आम बात सी हो गई है। यह आज के समय के जीवन की समस्या हैं, आधुनिक जीवन हमारे जीवन से बहुत सारी समस्याओं को समाप्त कर दिया। लेकिन इसकी अधिक लत होना। हमारी समस्या बन गई है, हमलोग थोड़ी सी भी दूरी जाते है तो बिना गाड़ी लिए नहीं निकलते हैं। इससे हम अपने शरीर को पूरी तरह से कार्य करने नहीं देते। पैदल चलने से जहां हमारे शरीर के अंगों को व्यायाम होता हैं। वहां हमलोग अपनी शरीर को निष्क्रिय। बना रखे है कुछ छोटी–छोटी समस्याएं होने पर दवाओं का इस्तेमाल करने लगता है। जिसकी वजह से हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता लगातार कम होती रहती हैं। हम जब भी किसी रोग के लिए एंटीबायोटिक दवा का उपयोग करते हैं, तो हमारा शरीर में उपस्थित बैक्ट्रिया उस दवा के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा लेता हैं। जिसकी वजह से उस व्यक्ति को और दवा का इस्तेमाल करना पड़ता है और यही क्रम चलता रहता हैं। जिससे उस व्यक्ति का शरीर प्रतिरोध क्षमता को खोता रहता है। उम्र ढलते रहने के कारण एक तो शरीर कमजोर हो ही जाता है दवा के कारण और कमजोर होता जाता है। एक ऐसी स्थिति आती हैं जहां व्यक्ति केवल दवा पर ही निर्भर रह जाता हैं।
क्या आपने कभी सोचा हैं पशु–पक्षी सबसे कम बीमार क्यों होते है क्योंकि वह हर मामूली रोगों के लिए दवा नहीं खाते हैं बल्कि आहार को संयमित कर अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा लेता है। आज कल सभी लोग स्वस्थ रहना चाहता हैं, वह रोग से मुक्त जीवन जीना चाहता हैं। लेकिन अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए नियमित व्यायाम या योग नहीं कर पाता हैं। चलिए तो अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए योग के बारे में जाने।
योग(Yoga):- योग शरीर मन और भावनाओं को संतुलित करने और तालमेल बनाने का एक साधन हैं। जिसे तन और मन दोनों स्वस्थ रहता है। योग के जन्मदाता महर्षि पतंजलि थे, भारतीय दर्शन साहित्य में पतंजलि के लिखे हुए 3 प्रमुख ग्रंथ मिलते हैं– योगसूत्र, अष्टाध्यायी पर भाष्य और आयुर्वेद पर ग्रंथ। पतंजलि एक महान चिकित्सक थे। पतंजलि रसायन विद्या के विशिष्ट आचार्य थे- अभ्रक, विंदास, धातुयोग और लौहशास्त्र इनकी देन है। पतंजलि संभवत: पुष्यमित्र शुंग (195-142 ईपू) के शासनकाल में थे। राजा भोज ने इन्हें तन के साथ मन का भी चिकित्सक कहा है। पतंजलि का जन्म गोनारद्य (गोनिया) में हुआ था लेकिन कहते हैं कि ये काशी में नागकूप में बस गए थे।
योग के प्रकार–
1. यम– जब व्यक्ति अहिंसा, सत्य और ब्रह्मचर्य जैसे गुणों को विकसित करता हैं, किसी व्यक्ति को शब्दों, विचारों और कर्मों से अकारण हानि नहीं पहुंचाता है, सत्य का पालन करता है ऐसी प्रवृति को यम योग कहते है।
2. नियम– नियम शरीर मन की शुद्धि, संतुष्ट रहना, अपने–आपको अनुशाषित करना और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और पूर्ण श्रद्धा रखना ही नियम कहे जाते है।
3. आसन– शांति पूर्वक किसी स्वच्छ स्थान बैठने की क्रिया आसन कहते हैं। चार प्रकार का आसन हैं–(i)सुखासन (ii) सिद्धासन (iii) पद्मासन (iv) वज्रासन
4. प्राणायाम– प्राणायाम स्वस्थ जीवन जीने का द्वार हैं। प्राणायाम के बारे में आगे पढ़ें।
5. प्रत्याहार– इंद्रियां मन को चंचल करती हैं, उन पांच इंद्रियों (नाक, कान, त्वचा, जीभ एवं आँख) को अपने वश में करना ही प्रत्याहार है।
6. धारण– किसी नकारात्मक विचार को हटा कर अपने मन में सकारात्मक विचार को ध्यान बनाए रखना। धारण कहलाता है।
7. ध्यान– किसी स्थान, वस्तु या विचार पर लगातार मन स्थिर करना, उस समय किसी अन्य वस्तुओं को मन में प्रकट न करना ही ध्यान कहलाता है।
8. समाधि– जब साधक/साधु भगवान की प्राप्ति के लिए चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता हैं, जिससे व्यक्ति मोक्ष प्राप्ति को संभव मानता है, उसे ही समाधि कहते हैं।
हाथ की मुद्राएं–
- ज्ञान मुद्रा– व्यक्ति स्वच्छ स्थान पर सुखासन या पद्मासन किसी भी मुद्रा में बैठकर अपने हाथों को घुटनों पर रखकर जिसमें हथेली ऊपर की तरफ हो, तर्जनी उंगली को गोलाकार मोड़कर अंगूठे के अग्रभाग को स्पर्श करता हो और अन्य तीनों अंगुलियों को सीधी रखा हो, इस मुद्रा को दोनों हाथों से करें। इसी मुद्रा को ज्ञान और ध्यान मुद्रा कहते हैं।
- पृथ्वी मुद्रा– इसे करने की प्रक्रिया शांति से बैठ कर अपने हाथों को अनामिका उंगली को मोड़कर अंगूठे के अग्रभाग से स्पर्श करें। इस प्रक्रिया को दोनो हाथों से करें।
लाभ– इस मुद्रा से पृथ्वी तत्व मजबूत होता है और शारीरिक दुबलापन दूर होता हैं। शरीर की पाचन की समस्या ठीक होती हैं, संयम और सहनशीलता बढ़ती हैं।
- वायु मुद्रा– इसे करने की प्रक्रिया तर्जनी उंगली को हथेली की ओर मोड़ते हुए अंगूठे से दबाएं। अन्य उंगली को सीधी रखें। ऐसे मुद्रा को वायु मुद्रा कहते है।
लाभ– यह वायु से कमी होने वाले सभी रोगों से बचाता हैं, जैसे गैस बनना, गठिया, डकार आना, हिचकी, उलटी, पैरालिसिस और स्पोंडीलैटिस इत्यादि विकार में लाभ होता हैं। और शरीर में दर्द, रक्त संचार की गड़बड़ी को ठीक करता है,मन की चंचलता समाप्त हो कर मन एकाग्र करता हैं।
- अग्नि/सूर्य मुद्रा– सबसे पहले अनामिका उंगली को मोड़कर, अनामिका उंगली के अग्रभाग से अंगुठे के मूल प्रदेश को स्पर्श करना हैं। अब अंगूठे से अनामिका उंगली को हल्के से दबाना हैं, इस तरह से अग्नि/सूर्य मुद्रा बनती हैं।
लाभ– रोज 5 से 10 मिनट करने से मोटापा से परेशान व्यक्ति अपना वजन कम कर सकता है। यह पाचन तंत्र को मजबूत करता है, इससे भय, क्रोध, शोक एवं तनाव दूर रहता हैं। और बढ़े हुए कॉस्ट्रोल को नियंत्रित करता है।
- जल/वरुण मुद्रा– कनिष्ठा उंगली को मोड़ कर, अंगुठे के अग्र भाग से गोलाकार लगाने से जल मुद्रा बनती हैं। ये सभी मुद्राएं अपने हाथ को घुटनों पर रखकर करें। जल मुद्रा को वरुण मुद्रा भी कहते हैं।
लाभ– इस मुद्रा से जल तत्व की कमी होने की समस्या ठीक हो जाती हैं, पेशाब संबंधित समस्या ठीक रहती हैं।
यदि आप अपने शरीर की इम्यूनिटी सिस्टम यानी की रोग प्रतिरोधक तंत्र को अधिक मजबूत करना चाहते है तो आपको अष्टांग योग में वर्णित प्राणायाम और इन मुद्राओं को अपने जीवन में नियमित रूप से करना चाहिए।

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