माँ सबसे बड़ी धैर्यवान क्यों होती हैं–
एक बार स्वामी विवेकानंद से एक व्यक्ति ने पूछा की मां सबसे बड़ी पूज्यनीय क्यों कहलाती हैं तब उन्होंने एक बात कही तुम ऐसा करो 5 सेर का एक पत्थर अपने पेट पर बांध कर रखों और एक दिन बाद फिर मेरे पास आना उसने ऐसा किया।
लेकिन वह कुछ घंटे के बाद ही वह परेशान हो गया जब वह थका—हारा आया तो स्वामी जी बोले तुम्हे यह बोझ कुछ घंटे भी नही उठाया गया किंतु मां अपने गर्भ में शिशु को नौ माह तक ढोती हैं और सारा काम करती है मां के अलावा कोई और धैर्यवान और पूज्यनीय कौन हो सकता हैं। मां धरती की भाती सहनशील होती है।
डर का सामना–
वाराणसी(बनारस) में विवेकानंद जी भ्रमण करने गए थे, शाम के समय वे एक मंदिर में दर्शन के लिए गए उस मंदिर में बहुत सारे बंदर थे, जब वह लौट कर जाने लगे तब एक बंदर का झुंड पीछे पर गया, उसे देख स्वामी जी तेजी से चलने लगा तो बंदर भी पीछे तेजी से चलने लग गया, वह जितना तेज से चलता बंदर भी उसी चाल से पीछे आते।
जब वह दौड़ने ही वाले थे की एक वृद्ध संत ने कहा भागो मत, डट कर सामना करो, यह सुन उनको साहस हुआ और बंदर की तरफ बढ़ने लगा। बंदरों ने दांत खिंसते हुए स्वामी जी को डराने का प्रयास किया, किंतु उन्होंने बंदर की तरफ बढ़ना बंद नही किया तो बंदरों ने धीरे–धीरे अपना रास्ता नाप लिया।
इस छोटी–सी घटना का विवेकानंद जी को एक बड़ी सिख दी, जिसका संबोधन स्वामी विवेकानंद ने अपने बाद के व्याख्याओं में दिया। उन्होंने कहा कि यदि तुम किसी चीज से भयभीत हो तो डरो मत। रुको, पलटो और उसका सामना करो।
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लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना–
स्वामी विवेकानंद अमेरिका में सितम्बर 1893 ई० को विश्वधर्म–सम्मेलन में संबोधन के लिए गए थे वह शाम के समय टहल रहे थे तो टहलते–टहलते वे एक नदी के किनारे पहुंचे जहाँ कुछ बच्चे नदी में बहते अंडे के छिलके को बंदूक से निशाना लगा रहे थे।
उन्होंने देखा की किसी भी बच्चे का निशाना
ठीक से नहीं लग रहा था तब उन्होंने बच्चे से बंदूक ली और एक–एक कर 12 ठीक निशाना लगाया।
तो बच्चे सब चकित हो गया और देखने लगा तो विवेकानंद जी ने कहा निशाना लगाते समय अपना
पूरा ध्यान लक्ष्य पर केंद्रित कर लगाओं। तब तुम्हारा निशाना ठीक लगेगा। इस बात को हम सबको ध्यान देना चाहिए।
अपने मंजिल पर ध्यान देना
एक बार विवेकानंद जी शाम को आश्रम में घूम रहा था। तभी एक आदमी अपनी समस्या लेकर आया। और स्वामी जी को प्रणाम किया। और उनसे पूछा कि स्वामी जी हम कितना भी मेहनत करते हैं लेकिन हमें कभी किसी काम में सफलता नहीं मिलती है। हमें बताएं कि हम क्या करें जो हमें सफलता मिल जाए। तब स्वामी जी ने कहा ठीक है मेरे पास एक कुत्ता है उसे तुम थोड़ा घुमाओ तब तक हम कुछ सोचता हूं।
तब वह आदमी उस कुत्ता को घुमाने ले गया। और कुछ देर बाद ले आया। तब स्वामी जी ने उस आदमी से पूछा कि यह कुत्ता इतना हाफ क्यों रहा है। जबकि तुम बिल्कुल भी थके नहीं लग रहे हो। तब वह आदमी ने कहा मैं सीधे रास्ते से आ रहा था। किंतु इस कुत्ता को जो भी दिखता वह उधर ही भागने लगता। यह सारे रास्ते इधर-उधर करता आ रहा था। इसीलिए वह इतना हाफ रहा है। इस पर स्वामी जी ने कहा बस यही है तुम्हारा जवाब। तुम्हारी सफलता की मंजिल तुम्हारे सामने ही होती है। लेकिन तुम अपने मंजिल के बजाय इधर-उधर भागते रहते हो। तब उस आदमी को विवेकानंद जी की बात समझ में आ गई। की सफलता चाहिए तो अपनी मंजिल पर ध्यान देना होगा।
स्वामी विवेकानंद का अनमोल विचार



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