मोहनदास करमचंद गांधी
मोहनदास करमचंद गांधी जिन्हें महात्मा गांधी, बापू और राष्ट्रपिता कहकर सम्बोधित किया जाता है। भारत के लोगों एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक मुख्य राजनैतिक सामाजिक कार्यकर्ता और आध्यात्मिक नेता थे। वे सत्य अहिंसा के पुजारी थे। जिसने भारत के लोगों को स्वतंत्रता दिलाया। और सारी दुनिया को जनता के नागरिक अधिकारों एवम स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया।
| महात्मा गांधी जी |
दुनिया में आम जनता महात्मा गांधी के नाम से जानती है। सबसे पहले 1915में राजवैद्य जीवराम कालिदास ने गांधी को महात्मा के नाम संबोधित किया था,
गांधी जी को बापू संबोधित करने वाले प्रथम व्यक्ति साबरमती आश्रम के उन्हीं का शिष्य थे। और राष्ट्रपिता कहकर सर्व प्रथम सुभाष चन्द्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को संबोधित किया। सुभाष चन्द्र बोस ने रंगून रेडियो से आजाद हिंद फौज के लिए महात्मा गांधी से राष्ट्रपिता कहकर आशीर्वाद और शुभकामनाएं मांगी थी।
उनके सम्मान, उनकी बताएं गई राहों पर चलने के लिए हमलोग 2अक्टूबर को गांधी जयंती और पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मानते हैं।
| गांधी जी का बचपन की तस्वीर |
गांधी जी का जन्म स्थान
महात्मा गांधी जी का जन्म गुजरात के एक नगर पोरबंदर नामक स्थान पर 2 अक्तूबर 1869ई० को हुआ था। महात्मा गांधी जी के पिता जी का नामक करमचंद गांधी था उनकी माता का नाम पुतली बाई थी। पुतली बाई करमचंद गांधी की चौथी पत्नी थी, उनकी पहली तीन पत्नियां प्रसव के समय मृत्यु हो गई थीं। गांधी जी के माता पिता भक्ति किया करते थे। और शाकाहारी जीवन, आत्मशुद्धि के लिए उपवास, अनेक जातियों के लोगों के बीच सहिष्णुता रखते थे।
इन्हीं कारणों से गांधी जी पर भी प्रभाव परा। गांधी का मतलब इत्र फुलेल बेचने वाला(परफ्यूमर) कहा जाता हैं।
मई 1883ई० को साढ़े 13वर्ष की आयु में गांधी जी को 14 वर्ष की कस्तूर बाई मकनजी से शादी कर दिया गया।
कस्तूर बाई मकनजी का नाम कस्तूरबा कर दिया, प्यार से लोग उसे बा कहकर पुकारते थे। यह बाल विवाह उस समय उस क्षेत्र में प्रचलित था। गांधी जी के चार संतान हुई हरिलाल गांधी, मणिलाल गांधी, रामदास गांधी और देवदास गांधी।
उन्होंने मिडिल क्लास तक की पढ़ाई पोरबंदर में ही की। और मैट्रिक की पढ़ाई राजकोर्ट से संपन्न की। कॉलेज की पढ़ाई उन्होंने भावनगर के शामलदास कॉलेज से उत्तीर्ण की।
मोहनदास करमचंद गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी की भूमिका
जब गांधी जी स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे तो उनके साथ भारत के लोगों के आलावा उनकी पत्नी भी थी। जो उसका साथ दे रही थी। उनके साथ मजबूत सहारा बनकर हमेशा खड़ा रही। गांधी जी के हर कदम की साथी बनी। बा गांधी जी के हर फैसले को स्वीकार किया और उनका साथ दिया।
जब गांधी जी आन्दोलन करने का फैसला किया तो सबसे पहला आंदोलन में भाग लेने वाला बा ही थी। उन्होंने ही उनका समर्थन किया। जब सबसे प्रथम बार दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी ने भारतीयों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई तो उनका समर्थन कस्तूरबा ने ही की। और इसके लिए उन्हें भी तीन महीनो तक जेल भी जाना पड़ा था। जब वह लौटकर भारत वापस आई तो वह अपने परिवार से मिलकर खुश थी। लेकिन जब गांधी जी आजादी के लिए रण में उतरा तो उन्होंने भी साथ हो ली। गांधी जी ने एक बार कहा था जब दक्षिण अफ्रीका में आन्दोलन हो रहा था तो उन आंदोलन में बा भी एक थी। जो कठिन से कठिन शारीरिक जुल्म सहे। फिर भी उन्होंने गांधी जी के साथ रही।
गांधी जी बा के बारे में कहा है, बा मजबूत इच्छाशक्ति वाली औरत थी। हमे किसी भी बात का हठ करने की आदत हो गया था, जो बा के मजबूत इच्छाशक्ति ने मुझे सक्षम बना दिया। बा ने हर मोड़ पर बापू का साथ निभाया था। कस्तूरबा ने उनके जीवन और लक्ष्यों को ही अपना जीवन और लक्ष्य बना लिया था।
जब गांधी जी ने चंपारण में सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया तो कस्तूरबा ने ही वहां की शिक्षा, स्वास्थ और भोजन जैसे मूल सुविधा में अपना योगदान दिया। कस्तूरबा ने वहां की महिलाओं की झोपड़ियों में जाकर मुलाकात की। उनकी दरिद्रता को करीबी से देखा। उन झोपड़ियों में महिलाएं तो तीन चार होती थी। लेकिन उनके पास साड़ी एक ही होती थी। वह भी आधा शरीर ढकने जितना ही। फिर कस्तूरबा ने अपने से ही चरखा चलाकर कपड़े बना कर लोगों को दिया। बा के बिना सत्याग्रह आंदोलन में महिलाएं भी शामिल नहीं हो सकती थी। सभी महिलों को आन्दोलन से जोड़ने में बा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। भारत छोड़ो आन्दोलन के समय जब गांधी जी मुंबई में जन सभा करनें से पहले गिरप्तार हो गए। तो उन जन सभा को कस्तूरबा गांधी ने ही संबोधित किया था। सही मायने में बा ने ही गांधी जी का अच्छी सहभागी रही।
| गांधी जी और उनकी पत्नी |
विदेश में शिक्षा और वकालत
गांधीजी कानून की पढ़ाई के लिए और बैरिस्टर बनने के लिए इंग्लैंड चले गए। इंग्लैंड आते समय जैन भीक्षु बेचारजी के समक्ष हिंदुओं को मांस,शराब तथा गलत विचारधारा को त्यागने के लिए अपनी माता को को वचन दिया था। इसकी कारण गांधी जी लंदन में रहते हुए भी कभी मांस,मछली ग्रहण नहीं किया। उन्होंने सदा शाकाहारी भोजनालय को अपनाया। लंदन में विश्व बंधुत्व प्रबल करने के लिए एक सोसाइटी की स्थापना की गई थी। और सनातन धर्म के साहित्य के अध्ययन के लिए समर्पित किया गया था उन्हीं लोगों ने गांधी जी को श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने के लिए प्रेरित किया।
जब गांधी जी लंदन से भारत लौट आने पर बम्बई में वकालत करने में उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली। गांधी जी ने भारतीय फर्म से नेटाल दक्षिण अफ्रीका में एक वर्ष के वकालत के कारोबार के लिए राजी हो गया, जो उस समय ब्रिटिश साम्राज्य का भाग था।
नागरिक अधिकारों के लिए आन्दोलन,दक्षिण अफ्रीका
दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी को भेद भाव का सामना करना पड़ा। उसे ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डब्बे के वैध टिकट होने के बाद भी उसे प्रथम डब्बे में नहीं बैठने दिया गया। और उन्हें ट्रेन के तीसरे डब्बे में बैठने जाने से इंकार करने पर उन्हें ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया था। उन्हें इस यात्रा में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। एक बार अदालत में न्यायाधीश ने पगड़ी उतारने का आदेश दिया जो उन्होंने नहीं माना। दक्षिण अफ्रीका में भारतीय पर हो रहे अन्याय और भेद भाव को खत्म करने के लिए वहां के भारतीयों को आग्रह किया इसमें वहां के आधी जातियों और काफिर जो कम आधुनिक थे। उन्होंने भी सरकार का विरोध किया।
| नमक सत्याग्रह आंदोलन |
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम:–
जब गांधी जी भारत रहने के लिए लोट आए, तो उन्होंने यहां भी ऐसा भेद भाव देखी। गाँधी जी 1918ई० में चम्पारण सत्याग्रह और खेड़ा सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया। चम्पारण में जब गांधी जी आया तो यहां के किसान से अंग्रेज द्वारा जीवन उपयोगी वस्तुओं का निर्वाह न करा कर नील की खेती कराई जाती थी। जिससे खेत की उपज शक्ति कम हो जाती थी उसके बाद इसमें कोई दूसरा फसल नहीं हो सकता था। वहां की अंग्रेजों की ताकत से दमन हुए भारतीयों को नाममात्र भरपाई दिया जाता था। जिससे वहां के किसान अत्यधिक गरीबी से घिर गई। अंग्रेजों के शाही कोष की भरपाई के लिए अंग्रेजों ने दमनकारी कर लगा दिया।जिनका बोझ दिन प्रतिदिन बढ़ता गया और किसान की हालत और खराब हो गई, गांधी जी ने इसका चम्पारण सत्याग्रह आंदोलन से विरोध किया। इसीकारण गांधी जी को अशांति फैलाने के कारण जेल में डाल दिया। लेकिन हजारों की संख्या में लोगों ने बिना शर्त गांधी जी को रिहा करने को कहा। और उसके बाद किसानों पर कर,मजबूरन मजदूरी करने,खेती पर नियंत्रण इत्यादि पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद पूरे भारत में गांधी जी की पहचान बढ़ गईं। और उसके बाद असहयोग आन्दोलन,स्वराज और नमक सत्याग्रह , दलित आन्दोलन और भारत छोड़ो आन्दोलन किया।
इन सभी आन्दोलन के प्रभाव से अंग्रेजो को नाक में दम हो गया। अंत में अंग्रेजों ने हार मानी और भारत को स्वतंत्र घोषित कर दिया। 30जनवरी 1948ई० को गांधी को नाथूराम गोडसे द्वारा गोली मार कर हत्या कर दी गई।।

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